Wednesday, August 23, 2017

मैं नटनी थी , मैं ठगनी थी , फिर भी धोखा खा गई
घर से चली थी हरि ठगन को , खुद को ठगा के आ गई .

सोचा तो था नैन मिलाके , हरि को अपना बना लूंगी
या थोडा सा नाच और गा के , अपना उसे बना लूंगी
ठगों का ठग हंस के यूं बोला - अच्छा तो ठगनी आ गई
घर से चली थी हरि ठगन को , खुद को ठगा के आ गई .

ऐसी धुन फिर छेड़ी उसने , खुद को ही मैं भूल गई
ना जाने कब आंचल ढलका , कहाँ मेरी पाजेब गिरी
पवन हिंडोले उड़ने लगी मैं , ऐसी खुमारी छा गई
घर से चली थी हरि ठगन को , खुद को ठगा के आ गई .

भेद है इसमें कितना गहरा , दिखने में तो बात जरा सी
वो कहे मैं दास तुम्हारा , मैं बोलूं मैं तेरी दासी
मैं बडभागन हुई सुहागन , जब से उसको पा गई
घर से चली थी हरि ठगन को , खुद को ठगा के आ गई .

Thursday, January 14, 2016

राधा की हर सांस पुकारे,मोहन,मोहन

राधा की हर सांस पुकारे,मोहन,मोहन,मोहन,मोहन
मोहन की हर सांस पुकारे, राधा,राधा,राधा,राधा
कौन बताए किसको पुकारा,किसने कम या ज़्यादा
राधा,मोहन,मोहन राधा,मोहन मोहन राधा.

प्राण  तो फूंके श्यामा  उसमें,बंसी बेशक श्याम की
जब से श्याम हुआ  श्यामा का,और श्यामा हुई श्याम की
दोनो पूरे,दोनो अधूरे,ना पूरा कोई आधा
राधा,मोहन,मोहन राधा,मोहन मोहन राधा.

कोई कहे राधा है सुंदर, बनवारी तो काला
कोई कहे वो निरी ग्वालन, सुंदर मुरली वाला
राधा बोले मोहन सुंदर,मोहन बोले राधा
राधा,मोहन,मोहन राधा,मोहन मोहन राधा.

भक्त पुकारें राधा को तो मोहन दौडे आएं
और मोहन का ध्यान करो तो राधा नज़र समाए
देहि  दो पर जान एक है, मोहन कहो या राधा
राधा,मोहन,मोहन राधा,मोहन मोहन राधा.

Sunday, January 10, 2016

राधा री क्यूं हुई बावरी,रो रो नैना खोवै ( प्रदीप नील )

राधा री क्यूं हुई बावरी,रो रो नैना खोवै
निर्मोही कब हुआ किसी का,तेरा कैसे होवै

तू क्या सोचै एक सांवरी,तू ही है घनश्याम  की
हुई दीवानी लाख गोपियां, बरसाने नंदगाम की
मोहन मोहन की रट लागी,जागै चाहे सोवै
राधा री क्यूं हुई बावरी,रो रो नैना खोवै

काज़र कारे नैन तिहारे,रो रो हो गए लाल री
ऐसी भी क्या प्रीत बावरी, हाल हुआ बेहाल री
माथे लिखा बिछोडा तेरे, आंसू कैसे धोवै
राधा री क्यूं हुई बावरी,रो रो नैना खोवै                                                                  

वो छलिया पूरी दुनिया को, ऐसे ही तरसाए
नज़र समाए बंसी बज़ाए, लेकिन हाथ ना आए
उस निर्मोही खातिर पूरी, दुनिया नैन भिगोवै
राधा री क्यूं हुई बावरी,रो रो नैना खोवै



सखी मैं तो हरी हुई हरि पाके ( प्रदीप नील )

        सखी मैं तो हरी हुई हरि पाके
        मैं नाचूं ,क्यूं ना एडी उठा के

जिस हरि को पाने खातिर,हरि हरि जग जपता है
वही हरि सुन मेरी सखी अब,मन मेरे में बसता है
       ये अखियां अब ना बाहर ताके
       सखी मैं तो हरी हुई हरि पाके

गुड मिले गूंगे को जैसे,हरि को पाके ऐसा लगा
मुझे पता है कैसा लगा,पर कह ना पाऊं कैसा लगा
      स्वर्ग तो मिले री जान गंवा के
      सखी मैं तो हरी हुई हरि पाके

कोई कहे मैं हुई बावरी,कोई कहे मस्तानी री
ऐसी दासी हुई हरि की,मैं पागल दीवानी री
     थकूं ना अब उसके गुण गा के
     सखी मैं तो हरी हुई हरि पाके

मोहन तुम मुख मोड ना लेना ( प्रदीप नील )

तू निष्ठुर है, तू निर्मोही, फिर भी हमको जान से प्यारा
मोहन तुम मुख मोड ना लेना,तुम बिन कोई नहीं हमारा

सूरज भी आए चंदा भी आए,तुम बिन मिटे नहीं अंधियारा
मोहन तुम मुख मोड ना लेना,तुम बिन कोई नहीं हमारा

कश्ती  और खेवट भी तू ही,  तू ही सागर तू ही किनारा
मोहन तुम मुख मोड ना लेना,तुम बिन कोई नहीं हमारा
     

रिश्ते नाते सारे ही झूठे, ना कोई साथी ना  ही  प्यारा
मोहन तुम मुख मोड ना लेना,तुम बिन कोई नहीं हमारा

भक्ति की शक्ति  भी तू ही, कितनों को तुमने पार उतारा
मोहन तुम मुख मोड ना लेना,तुम बिन कोई नहीं हमारा

सांस बसे तू,प्राण बसे तू, तू ही तो जीवन  आधारा
मोहन तुम मुख मोड ना लेना,तुम बिन कोई नहीं हमारा

जल में तुम्ही हो,थल में तुम्ही हो, चारों  दिशा ही तेरा नज़ारा
मोहन तुम मुख मोड ना लेना,तुम बिन कोई नहीं हमारा

मांगू  शरण  तेरी,धूलि चरण तेरी,मोहन दे दो मुझे सहारा
मोहन तुम मुख मोड ना लेना,तुम बिन कोई नहीं हमारा





माखन चोर है नंद का लाला, गली गली में शोर री ( प्रदीप नील )

माखन चोर है नंद का लाला, गली गली में शोर री
कैसा माखन छोड सखी वो चित को चुराए चोर री।

इस सीने में होता था दिल
आज संभाला कैसी मुश्किल
बडे ज़ोर से था जो धडकता अब तो नहीं इस ठौर री
कैसा माखन छोड सखी वो चित को चुराए चोर री।

ना कोई पूछे ना ही बताए
वो कान्हा क्यूं सब को भाए
एक बार वो जिसे नचाए,उसे भाए ना कोई और री
कैसा माखन छोड सखी वो चित को चुराए चोर री।

इस कान्हा को मैं ना छोडूं
दिल का नाता ऐसा मैं जोडूं
वो जाए जिस ओर् सखी जाऊं मैं भी उस ओर री
कैसा माखन छोड सखी वो चित को चुराए चोर री।

मेरा कान्हा बडा निराला
सीधा सादा मुरली वाला
उस नटवर के साथ मैं बांधू जीवन की अब डोर री
कैसा माखन छोड सखी वो चित को चुराए चोर री।

सखी री नाचें सारी रात ( प्रदीप नील )

वो कान्हा ने बंसी बजाई,पोर पोर में मस्ती छाई
निकली तारों की बारात, रास रचाएं सारी रात
सखी री नाचें सारी रात, सखी री नाचें  सारी रात

खुलती है तो खुले पैंजनिया,गिरती है तो गिरे नथुनिया
रुकने की कोई करे ना बात,सखी री नाचें सारी रात

चुनरी गिरे तो गिरने दो,कांटा चुभे तो चुभने दो
छूटे ना नटवर का हाथ,सखी री नाचें सारी रात

धरती झूमे अंबर झूमे,राधा झूमे गिरधर झूमे
झूमे गोकुल का हर पात,सखी री नाचें सारी रात

कान्हा बंसी ज़ोर बजाओ,खुद भी नाचो हमें नचाओ
अभी तो बाकी लंबी रात,सखी री नाचें सारी रात

इतना नाचें सांसें हांफें, थक के चूर पांव भी कांपें
टूट बिखर जाने दो गात,सखी री नाचें सारी रात
वो कान्हा ने बंसी बजाई,पोर पोर में मस्ती छाई
निकली तारों की बारात, रास रचाएं सारी रात
सखी री नाचें सारी रात, सखी री नाचें  सारी रात
                                   ***

मन बोले बनवारी हरदम्, तन बोले गिरधारी ( प्रदीप नील )

मेरे नटवर नागर जब से, आया शरण  तिहारी
मन बोले बनवारी हरदम्, तन बोले गिरधारी

मन था मेरा मैला कुचैला, तुम्ही को पा के साफ हुआ
आंख खोल के चलूंगा दाता, जो बीता सो माफ हुआ
अब ना भटकूंगा रस्ते से, कसम तुम्हारी  बांके बिहारी
मन बोले बनवारी हरदम्, तन बोले गिरधारी

तुम्ही बताओ मेरे भगवन, किसने खोजा किसने पाया
मुझमें जोत समाई तेरी, मैं भी तेरे मन में समाया
मैं हूं आत्म,तू परमात्म, फर्क ही कैसा कुंज बिहारी
मन बोले बनवारी हरदम्, तन बोले गिरधारी

तेरी भक्ति ही मेरी शक्ति ,बसे रहो मेरे मन मंदिर
मैं जो गगरी,तुम हो सागर, एक ही जल है बाहर अंदर
तेरे अधर लगी मैं मुरली, तेरे बजाए बजूं मुरारी
मन बोले बनवारी हरदम्, तन बोले गिरधारी

राधा री तूने कान्हा कैसे रिझाया ? ( प्रदीप नील )

राधा री तूने कान्हा कैसे रिझाया ?
भाग मिलाई जोडी या फिर भाग से लड़ के पाया ?

उस कान्हा के दर्शन पाने, ब्रज मै चल के आई
कुंज गलियन में कान्हा कान्हा,देती रही दुहाई
मुस्काए वो दूर से छलिया,लेकिन पास ना आया
  राधा री तूने कान्हा कैसे रिझाया

पूरे ब्रज में खोज खोज के, मैं हार गई गोपाला
कदम्ब की डाली तुम्ही बताओ,कहां है मुरली वाला
उसका पता बता दो कोई, अगर किसी ने पाया
  राधा री तूने कान्हा कैसे रिझाया

इतना बडा जहान बसे पर, कान्हा बिन वीराना
धुन लगी उसकी अब ऐसी,मनवा हुआ मस्ताना
मुझे अब कैसे भाए कोई ,कान्हा नैन समाया
  राधा री तूने कान्हा कैसे रिझाया

श्याम तेरी डोर राधिके हाथ ( प्रदीप नील )

श्याम  तेरी डोर राधिके  हाथ
बनो फिरै बेशक तू जगन्नाथ

कहने को तो मोहनी मुरलिया, अधर तुम्हरे हरदम साजे
जब राधा की बजे पैंजनियां, तभी तुम्हारी मुरली बाजे
तब ये दिन देखे ना ये रात
श्याम तेरी डोर राधा के हाथ

हर गोपी को भ्रम यही के ,कान्हा तो है सिर्फ उसी का
मीरा, रुक्मण तक ये जाने,  बिन राधा तू नहीं किसी का
ना जाने कितने युगों का साथ
श्याम तेरी डोर राधा के हाथ

राधा-माधव तुम्हे पुकारें, चाहे बोलें राधेश्याम
तेरे नाम से पहले मोहन, आता है राधा का नाम
है सौ बातों की बस यही बात
श्याम तेरी डोर राधा के हाथ


आजा गिरधारी तू आजा गिरधारी ( प्रदीप नील )

        

राधा बेचारी फिरे मारी मारी
छुपा है कहां मेरा बांके बिहारी
आजा गिरधारी तू आजा गिरधारी,आजा गिरधारी तू आजा गिरधारी।

सखियन से जाके करे अरजोई
खोज लाओ मुरलीवाला री कोई
बदले में ले लो दौलत ये सारी
आजा गिरधारी तू आजा गिरधारी,आजा गिरधारी तू आजा गिरधारी।

ग्वालन से पूछैं कभी जमुना पै देखें
कदंब कि डाली भी चढ चढ खोजैं
गोकुल की गलियन भी छान दीनी सारी
आजा गिरधारी तू आजा गिरधारी,आजा गिरधारी तू आजा गिरधारी।

फूट फूट रोए राधा आंचल भिगोए
श्याम  नहीं खोए मैंने तीनों लोक खोए
आंचल से बांधा नहीं गई मति मारी
आजा गिरधारी तू आजा गिरधारी,आजा गिरधारी तू आजा गिरधारी।

आया इक ग्वाला गोरे रंग वाला
बोला राधा प्यारी हमीं हैं मुरारी
मैं ही बिहारी तेरा मैं ही बिहारी 
मैं ही गिरधारी हूं  मैं ही गिरधारी। मैं ही गिरधारी हूं  मैं ही गिरधारी।


राधा  नहीं मानै ना उसे पहचानैं
मेरा कान्हा काला तू गोरे रंग वाला
चला जा यहां से नहीं तो दूंगी गारी
आजा गिरधारी तू आजा गिरधारी,आजा गिरधारी तू आजा गिरधारी।

हंस के तब कान्हा ने राधा को बताया
रंग चढा तेरा अंग तूने जो लगाया
देख ज़रा दर्पण तू भी हो गई कारी
मैं ही मुरारी हूं तेरा बनवारी
देखो मेरी श्यामा  तेरा बांके  बिहारी
मैं ही गिरधारी हूं  मैं ही गिरधारी।
मैं ही गिरधारी हूं  मैं ही गिरधारी।

Saturday, June 18, 2011

मोहे गोकुल ऐसो भायो सखी

मोहे गोकुल ऐसो भायो सखी ,मैं तो भूल गई  बरसानो री
जहाँ श्याम बसे मैं बसूं वहीँ ,का पूछो हो मेरो ठिकानो री 

     कहें गोपियाँ माखनचोरी करे वो नंदकिशोर  री 
    धर के हथेली दिल दे आई ,कैसे कहूँ चित्तचोर री
    चलो ना कोई जोर री , मैं किसने देऊ  उल्हानो  री    
    जहाँ श्याम बसे मैं बसूं वहीँ ,का पूछो हो मेरो ठिकानो री

ऐसी भई मैं श्याम की श्यामा , मैं तो हुई बडभागन  री
जागत जागत खोवन लगी  मैं ,सोवत सोवत जागन री
अब श्याम रहे मेरी आंखन मैं, जग दिखे बेगानों  री
जहाँ श्याम बसे मैं बसूं वहीँ ,का पूछो हो मेरो ठिकानो री                                                                                 

     सबई कहें ठगन को ठग है ,जो है नन्द को लालो
     मैं का मानू बात सखी  वो  मेरे है देखो- भालो
     देखन मैं बेशक है कालो , वो सबने करे दीवानों री   
जहाँ श्याम बसे मैं बसूं वहीँ ,का पूछो हो मेरो ठिकानो री


प्रदीप नील ,हिसार ,हरियाणा -१२५००१                   

























Monday, February 7, 2011

राधा गोकुल में नीर बहाए

कान्हा काहे को तू मुस्काए रे
राधा गोकुल में नीर बहाए रे

रानी हजारों तेरी रुक्मण पटरानी
तेरे सिवा ना किसी की राधारानी
कहे मोहन कोई ढूंड  के लाए रे
राधा गोकुल में नीर बहाए रे

तेरे महल कान्हा नित ही दिवाली
राधा की तुम बिन पूनम भी काली
रो रो नैनों की जोत गंवाए रे
राधा गोकुल में नीर बहाए रे
लाखों को पार कान्हा तूने उतारा
बस जीते जी तूने राधा को मारा
फिर क्यों पालनहार कहाए रे
राधा गोकुल में नीर बहाए रे

*** प्रदीप नील  हिसार हरियाणा   09996245222***

राधा री तेरा कान्हा दे दे उधार

सखी:-राधा री तेरा कान्हा दे दे उधार
         अगर तू मुझ से करती प्यार
        राधा री तेरा कान्हा दे दे उधार
राधा:- सखी मोहे तुमसे लाख है प्यार
          मगर तू मांग ना कान्हा  उधार
सखी:- अगर मुझे तू कान्हा दे दे,में क्या उसको खा जाऊँगी
         बस थोड़ी सी छाछ पिला के, वापस तेरा दे जाऊँगी
        तू मुझ पे कर ना शक बेकार
       राधा री तेरा कान्हा दे दे उधार
राधा:- अगर तुझे में कान्हा दे दूँ सोच मेरा क्या होगा हाल
          कान्हा मेरे प्राण बसे हैं, प्राण में दे दूँ कैसे निकाल
          उतार दे मेरे सीने कटार
          मगर तू मांग ना कान्हा  उधार
         मुझे चाहे ज़िंदा छोड़ या मार
          मगर तू मांग ना कान्हा  उधार
*** प्रदीप नील हिसार हरियाणा  09996245222 ***


       

         

Sunday, February 6, 2011

कान्हा तू ही है हरजाई रे

कैसी प्रीत की रीत चलाई रे
कान्हा तू ही है हरजाई रे

राधा को रोते तूने गोकुल में छोड़ा
भोली ग्वालिन का दिल तुमने तोडा
तुम्हे  याद ना किसी की  आई  रे
कान्हा तू ही है हरजाई रे

रुक्मण बनाई फिर तूने पटरानी
दिल में बसे  लेकिन तेरे  राधारानी
तूने दोनों से की बेवफाई रे
कान्हा तू ही है हरजाई रे

मीरा ने बचपन से वर तुमको माना
लेकिन कब जोगन को तूने पहचाना
तेरे द्वारिका भी वो आई रे
कान्हा तू ही है हरजाई रे

** प्रदीप नील हिसार हरियाणा -- 09996245222

हमारी सुध ले लो बनवारी

कभी आओ गोकुल देश हमारी सुध ले लो बनवारी
तुम बिन सूनी हुई रे नगरिया राधा रो रो हारी
राधा रो रो हारी रे मोहन   राधा रो रो हारी

गए हो जब से कान्हा रे तुम जमुना भूली बहना
मोर पपीहे कह के उड़ गए बिन मोहन क्या रहना
लग के गले पेड़ों के रोए.  तेरी राधा प्यारी
राधा रो रो हारी रे मोहन   राधा रो रो हारी

खोजें तुमको मेरी नजरिया, कहीं अब लागे जी ना
तुम बिना जीना भी क्या जीना ये जीना नहीं जीना
रो रो लाल हुई ये आँखें होती थी कजरारी
राधा रो रो हारी रे मोहन    राधा रो रो हारी

भक्तों ने जब तुम्हे पुकारा दौड़े दौड़े आए
प्राणों की प्यारी तुम्हे पुकारे मोहन तू ना आए
भूला भी तो अपनी ही राधा ,कहलाए तू  त्रिपुरारी

*** प्रदीप नील   हिसार हरियाणा --- 09996245222

होरी खेलन आए री कान्हा ( प्रदीप नील )


होरी खेलन आए री कान्हा ,होरी खेलन आए
राधा छुपी क्यूँ चढ़ के अटरिया , काहे तू शर्माए

सुबह सवेरे तुमने उठकर द्वारे रची रंगोली
इतराती तुम घूम रही थी आयेंगे हमजोली
मन  की मुराद हुई तेरी पूरी हमजोली तेरे आए
होरी खेलन आए री कान्हा ,होरी खेलन आए

घेरे खड़ी कान्हा को गोपी,  देख  तेरे  बरसाने  की
लेकिन साध है कान्हा के मन तुम्हे  ही रंग लगाने की
काहे को तड़पे तू भी बावरी काहे उसे तडपाए
होरी खेलन आए री कान्हा ,होरी खेलन आए


एक बरस तू जिसको है तरसी, होली है यह होली
आज भी तुम शर्माती रही तो,होली तो फिर होली
बाहर निकल के देख सांवरिया देखें आस लगाए
होरी खेलन आए री कान्हा ,होरी  खेलन आए 

* प्रदीप नील  हिसार हरियाणा                   
09996245222

हुई चुनरिया लाल री माँ होली में ( प्रदीप नील )

बरसा रंग गुलाल री माँ होली में
हुई चुनरिया लाल री माँ होली में

में तो चढी थी छुप के अटरिया
जाने कहाँ से आया री सांवरिया
घेर लई नन्दलाल री माँ होली में 
हुई चुनरिया लाल री माँ होली में  


कितना ही रोका बचा नहीं पाई
नन्द के छोरे ने पकड़ी कलाई
बिखरे मेरे बाल री माँ होली में 
हुई चुनरिया लाल री माँ होली में  

मुझको जकड़  के आँखों में झांके
मेरी तो हलक में रुक गई साँसें
हुए गुलाबी गाल री माँ होली में 
हुई चुनरिया लाल री माँ होली में 

कितना मनाया ना माने नन्दलाला
उसने तो मां मुझे  पूरा रंग डाला
हाल हुआ बेहाल री माँ होली में 
हुई चुनरिया लाल री माँ होली में 


बरसा रंग गुलाल री माँ होली में
हुई चुनरिया लाल री माँ होली में


         प्रदीप नील
हिसार हरियाणा  09996245222



कौन सुख पायो कान्हा

         
                     कौन सुख पायो कान्हा मथुरा में जाई के
                      राधा को रोती छोड़ गोपियन भुलाई के
गोकुल का चैन  सुख संग अपने ले गया
ग्वाल बाल गोपियन की झोली आंसू दे गया
खुश रहते होंगे सबका जियरा दुखाई के
कौन सुख पायो कान्हा मथुरा में जायके
                    डोले आगे पीछे तेरे मथुरा की गोरियां
                   उनसे क्या बांकी नहीं ब्रज  की हम छोरियां
                  सच कहना हम सबकी कसम उठाई के
                  कौन सुख पायो कान्हा मथुरा में जाई के
मोर छपी ओढ़नी क्या दिखती है वहां पे
एक भी राधा जैसी सारी मथुरा में
खोज लेना पूरी दुनिया दीपक जलाई के
 कौन सुख पायो कान्हा मथुरा में जाई के
                  वहां का बिछोना अच्छा कदम्ब की या डाली
                  मथुरा की बोली मीठी ब्रज की या गाली
                 न्याय तनिक कर दो कचहेरी लगाई के
                 कौन सुख पायो कान्हा मथुरा में जाई के
गय्या तो होगी कान्हा,  तेरी मथुरा में
एक भी क्या दौड़ी  आती जैसे गोकुल  में
देख लेना किसी दिन बंसी बजाई के
 कौन सुख पायो कान्हा मथुरा में जाई के
                बैठते तो होंगे माखन थाली में सजाई के
                सोचते तो होंगे उसको हाथ में उठाई के
                 वैसा स्वाद कहाँ खाया जो चुराई के
                 कौन सुख पायो कान्हा मथुरा में जाई के 
नन्द गाँव बजती थी बंसी  बड़ भागन
मथुरा में जाते ही हुई  वो अभागन                                                                                                        नहीं तो क्यूँ रखा उसे ताक पे उठाई के                                                                                                कौन सुख पायो कान्हा मथुरा में जाई के
            बैठी वहां छोड़ी जहाँ राधा इंतजार में
             तिरलोकी हार बैठी इक तुम्हे हार के
             राह तके कान्हा तेरी पलकें बिछाई के
          कौन सुख पायो कान्हा मथुरा में जाई के
                                                                         प्रदीप नील ,  हिसार हरियाणा         09996245222
                                                                                
                                                                         

Saturday, February 5, 2011

री माँ मेरा रोने को मन तरसे ( प्रदीप नील )

                          री माँ मेरा रोने को मन तरसे
                          काश गोकुल में बादल बरसे

कान्हा झोली पीड दे गया ,जब से छुडाया उसने  साथ
ग्वालिन इतना नीर बहावे जमुना चढ़ गई दो दो हाथ
एक अभागिन मैं ही बची माँ बारिश की बदली सी डोलूं
कोई न देखे आँख का पानी बदरा बरसे जी भर रो लूँ
                      बिजुरिया चमके तो मन हर्षे
                    री माँ  गोकुल में बादल बरसे
                                 (२ )
                    मैं भटकूँ निश् दिन ठांव-कुठाँव
                    काश कोई कांटा चुभे मेरे पाँव
जब से बिछुड़ी मैं कान्हा से, भर भर आयें बैरन अँखियाँ
लाज़ की मारी रो भी न पाऊं, ताने मुझको देंगी सखियाँ
काँटा चुभ के घाव बने तो घाव उम्र भर लिए फिरुंगी
रोज बहाना ले पीड़ा का, जी भर के रो लिया करुँगी
             उम्र भर रहना है गोकुल गाँव
            री माँ लो काँटा चुभा मेरे पाँव
                            ( ३ )
              री माँ सारा गोकुल ही बिसरावै
               कि राधा गीली लकड़ी जलावै
मेरा मन और गीला ईंधन,   दोनों की ही एक दशा
अभी लगे ज्यूँ अभी जला,अभी लगे ज्यूँ अभी बुझा
ना ही जले और ना ही बुझे ये सुलग सुलग कर दे धुआं
सब नैनों को चुभे री माँ ये मेरी आँख की बनी दवा
       आँख मेरी नीर ही नीर बहावे
      राधा क्यूँ ना गीली लकड़ी जलावे